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क्या टैरिफ से बचा ट्रंप – रूस, क्यूबा और उत्तर कोरिया को छोड़ में कैसे बची?

क्या टैरिफ से बचा ट्रंप – रूस, क्यूबा और उत्तर कोरिया

क्या टैरिफ से बचा ट्रंप – रूस, क्यूबा और उत्तर कोरिया को छोड़ में कैसे बची?

जब ट्रंप ने अप्रैल 2025 में “Liberation Day” के रूप में बड़े पैमाने पर टैरिफ लगाने की घोषणा की, तो दुनिया भर में हलचल मच गई। अमेरिका ने दर्जनों देशों के उत्पादों पर 10% से लेकर 50% तक के नए ‘reciprocal tariffs’ लागू करने का एलान किया—लेकिन एक खास बात यह रही कि रूस, क्यूबा और उत्तर कोरिया जैसे देश इससे पूरी तरह बच निकले

सोचें अगर ट्रंप इतनी दृढ़ता के साथ भारत और चीन जैसे बड़े देशों पर टैरिफ लगा रहे थे, तो फिर सबसे बड़े “धमकी देने वाले” और बंद व्यापार वाले राष्ट्र—रूस और उत्तर कोरिया—से क्यों मुकर गए? यह सवाल भी बहुत कुछ बयान करता है।

ट्रंप के टैरिफ से भड़का चीन:
ट्रंप के टैरिफ से भड़का चीन:

क्यों बच गए टार्गेट देशों से?

1. पहले से ही कड़े प्रतिबंध

ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट किया कि रूस, क्यूबा, बेलारूस और उत्तर कोरिया पर पहले से ही गैर-टैक्स संरचनात्मक प्रतिबंध (sanctions) लगाए हुए हैं
इसलिए उनके साथ व्यापार पहले से ही बेहद सीमित था—नया टैरिफ जोड़ना बेकार ही माना गया।

2. वास्तविक व्यापार की कमी

उत्तर कोरिया के साथ अमेरिका का व्यापार लगभग नगण्य है, इसलिए टैक्स का कोई मतलब ही नहीं बनता
अगर व्यापार इतनाभी कम था, तो अतिरिक्त टैरिफ का कोई आर्थिक उद्देश्य नहीं था।

3. राजनीतिक और रणनीतिक हित

विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की नीति में geopolitical हिन्टरव्यू भी था– जैसे कि रूस के साथ संवेदनशील वार्ता, या उत्तर कोरिया को पूरी तरह अतिवादी रवैया दिखाना, वास्तव में एक सख्त डिप्लोमैटिक जवाब हो सकता था। इसलिए व्यापक आर्थिक नुकसान टालने के लिए उन्हें इस लिस्ट से बाहर रखा गया


ट्रंप की टैरिफ नीति: तुक और प्रस्तावना

  • 2 अप्रैल 2025 को ट्रंप ने “Liberation Day” के तहत आदेश जारी किया, जिसमें लगभग हर देश पर 10% बेसलाइन टैरिफ लागू करने की बात कही गई—कुछ पर 50% तक के शुल्क

  • बाद में 7 अगस्त से नए “reciprocal tariffs” लागू हो गए, जिसमें कई देशों को अलग-अलग दरें दी गईं—लेकिन रूस, क्यूबा और उत्तर कोरिया को पूरी तरह छोड़ दिया गया


वैश्विक और घरेलू प्रभाव

  • विनिमय दर और बाज़ार स्थिरता: इन टैरिफ़ से विश्व बाज़ारों में भारी अनिश्चितता बनी रही।

  • राजनीतिक संदेश: ट्रंप यह दिखाना चाहते थे कि दबंग राष्ट्रों से भी समझदारी से निपटा जा रहा है—लेकिन आर्थिक रूप से कम जुड़े हिस्सेदारों को छोड़कर।

  • दबाव बनाम आर्थिक ज़रूरत: ट्रेड पॉलिसी में पारंपरिक साज़िश नज़र आई—जहाँ कुछ देशों को टार्गेट कर पाने में राजनीतिक फायदा था, तो दूसरों को छोड़ना ज़रूरी समझा गया।

ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी, जहाँ बड़े व्यापारिक साझेदारों को निशाना बना रही थी, वहीं उसने सबसे बड़े ‘धमकी देने वाले राष्ट्रों’ से सावधानी से दूरी बनाते हुए अपना रुख स्पष्ट कर दिया
अंततः, टैरिफ की राजनीति में मजबूती और समझदारी दोनों साथ-साथ चलीं—शायद यही कारण है कि जो सबसे बड़े खतरनाक खिलाड़ी थे, उन्हें इस व्यापार युद्ध में टार्गेट नहीं किया गया।


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