“धीरेंद्र शास्त्री पर अखिलेश यादव की टिप्पणी और संत की सहनशीलता: सनातन धर्म बनाम सियासत”
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देश की राजनीति और धर्म जब टकराते हैं, तो बहसें गर्म होती हैं और बयानबाज़ी चरम पर पहुंच जाती है। ऐसा ही कुछ हाल ही में तब हुआ जब समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने इटावा में एक जनसभा के दौरान कथावाचकों की फीस और उनके ‘होनहार व्यवहार’ को लेकर तंज कसा। उन्होंने कहा कि “कई कथावाचक 50 लाख रुपए तक फीस लेते हैं, और उनमें से कई अंडर टेबल लेन-देन भी करते हैं। हर किसी की हैसियत नहीं होती कि वे धीरेंद्र शास्त्री जैसे संतों को अपने घर बुला लें।”
इस बयान से जहां राजनीतिक गलियारों में गर्माहट बढ़ी, वहीं सनातन धर्म के अनुयायियों में नाराज़गी साफ दिखाई दी। अखिलेश यादव का निशाना चाहे अघोषित रूप से हो, लेकिन धीरेंद्र शास्त्री को इसमें घसीटा गया और इस पर उनकी प्रतिक्रिया आई भी शांत, संतुलित और बिल्कुल उनके व्यक्तित्व के अनुरूप।
धीरेंद्र शास्त्री का जवाब: सहनशीलता की मिसाल
धीरेंद्र शास्त्री, जिन्हें बागेश्वर धाम सरकार के नाम से भी जाना जाता है, ने इस टिप्पणी पर न तो क्रोध जताया, न पलटवार किया। उन्होंने बस इतना कहा:
“हमें बोलने से ज्यादा सहना पड़ता है। यह जीवन बहुत ही ज्यादा कठिनाइयों से भरा है। इसमें चुनौतियां भी हैं। हमारे ऊपर टिप्पणी करने वालों की रोटी पच रही है और भगवान करें कि उनकी रोटी पचती रहे। हम तो सनातन के लिए जिएंगे और सनातन के लिए मरेंगे।”
यह बयान न केवल विनम्रता दर्शाता है, बल्कि एक संत की दृष्टि भी सामने लाता है जो आलोचना को व्यक्तिगत नहीं लेता, बल्कि उसे ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करता है।
धार्मिक गुरु और राजनीति: एक अनसुलझा द्वंद्व
भारत जैसे देश में, जहां धर्म और राजनीति का चोली-दामन का साथ है, वहां ऐसे बयानों से विवाद होना नई बात नहीं है। लेकिन जब एक संत पर इस तरह का आर्थिक आरोप सार्वजनिक मंच से लगाया जाता है, तो उससे धर्म के अनुयायियों की भावनाएं आहत होती हैं।
यह सच है कि कुछ कथावाचक बड़ी-बड़ी फीस लेते हैं, मगर इसका मतलब यह नहीं कि हर संत को उसी तराजू में तौला जाए। खासकर तब, जब धीरेंद्र शास्त्री जैसे संत अपने प्रवचनों और चमत्कारी कथाओं से लाखों लोगों को आध्यात्मिक रूप से जोड़ चुके हैं।
जनता क्या सोच रही है?
सोशल मीडिया पर इस विवाद को लेकर जनता की राय बंटी हुई है। कई लोग अखिलेश यादव के बयान को ‘सनातन विरोधी’ बताते हुए आलोचना कर रहे हैं, तो कुछ लोग इसे ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ मानते हुए समर्थन भी दे रहे हैं। वहीं, बहुत से लोग धीरेंद्र शास्त्री के संयम और गरिमापूर्ण प्रतिक्रिया की सराहना कर रहे हैं।
क्या राजनीति को धर्म से दूर रहना चाहिए?
यह प्रश्न हमेशा से चर्चा का विषय रहा है। लेकिन जब राजनेता धार्मिक गुरुओं पर व्यक्तिगत आरोप लगाते हैं, तो यह सिर्फ विवाद पैदा नहीं करता, बल्कि समाज के भीतर विभाजन को और गहरा करता है। धर्म का काम जोड़ना है, और राजनीति का मकसद भी यदि यही हो, तो विवाद की जगह संवाद हो सकता है।
धीरेंद्र शास्त्री का संदेश
इस पूरे प्रकरण में धीरेंद्र शास्त्री का जवाब न केवल अनुकरणीय है, बल्कि यह भी दिखाता है कि सनातन धर्म सिर्फ पूजा-पाठ का नाम नहीं, बल्कि सहनशीलता और धैर्य का प्रतीक भी है। जब सामने वाला आलोचना कर रहा हो, तब शांत रहना एक तरह की शक्ति है — और धीरेंद्र शास्त्री ने वह शक्ति दुनिया को दिखाई है।













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