पाकिस्तान में मदद की रकम का इस्तेमाल क्यों नहीं हो सका? ’11 अरब डॉलर का इस्तेमाल करने में नाकाम…
पाकिस्तान की शाहबाज शरीफ सरकार इन दिनों तीखी आलोचना झेल रही है. वजह साफ है—वो 11 अरब डॉलर की विदेशी मदद, जिसका उपयोग अब तक सही तरीके से नहीं हो पाया. वर्ल्ड बैंक, एशियन बैंक और अमेरिका ने पाकिस्तान को ये मदद बाढ़ से उबरने के लिए दी थी. लेकिन आज हालत ये है कि न तो कोई बड़ा प्रोजेक्ट शुरू हुआ और न ही जनता को राहत मिल पाई. इस नाकामी को लेकर पाकिस्तानी एक्सपर्ट कमर चीमा ने सरकार पर जमकर निशाना साधा है.
बाढ़ त्रासदी के बाद बड़ी उम्मीदें
साल 2022 में पाकिस्तान भयंकर बाढ़ से जूझा. लाखों लोग बेघर हुए, हजारों की मौत हुई और अरबों डॉलर की संपत्ति तबाह हो गई. उस वक्त पूरी दुनिया पाकिस्तान के साथ खड़ी नजर आई. वर्ल्ड बैंक और एशियन बैंक ने अरबों डॉलर की मदद का ऐलान किया. अमेरिका और कई खाड़ी देशों ने भी हाथ आगे बढ़ाया. उस समय लगा कि पाकिस्तान जल्द ही राहत और पुनर्निर्माण की राह पर लौट आएगा.
लेकिन आज, दो साल से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी तस्वीर वैसी ही है. न तो ढांचे सुधरे, न घर बन पाए और न ही पीड़ितों को भरोसेमंद सहायता मिल पाई.
कमर चीमा का बड़ा आरोप
पाकिस्तानी राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार कमर चीमा ने कहा है कि असली समस्या सरकार की अक्षमता है. उनके मुताबिक, “दुनिया ने हमसे सवाल किया कि आप इन पैसों से क्या करेंगे, कौन से प्रोजेक्ट चलाएंगे? लेकिन सरकार ने ठोस योजनाएं ही पेश नहीं कीं. पैसा पड़ा रह गया और लोग परेशान होते रहे.”
चीमा ने यह भी कहा कि शाहबाज शरीफ की सरकार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर केवल तस्वीरें और भाषण देने में लगी रही, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ नहीं हुआ. यही वजह है कि अब दान देने वाले देश और संस्थाएं भी पाकिस्तान पर भरोसा करने से हिचकिचा रही हैं.
सरकार की उलझनें
शाहबाज सरकार का कहना है कि फंड्स के इस्तेमाल में कई प्रशासनिक और तकनीकी दिक्कतें हैं. प्रोजेक्ट तैयार करने, मंजूरी लेने और कार्यान्वयन की प्रक्रिया लंबी होती है. लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या वाकई दो साल इतने काफी नहीं थे कि कम से कम शुरुआती कदम उठाए जा सकें?
विशेषज्ञों का मानना है कि भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता इस सुस्ती की बड़ी वजह है. पाकिस्तान की राजनीति में लगातार हो रहे बदलाव और सत्ता की खींचतान ने भी स्थिति को और बिगाड़ दिया.
जनता का गुस्सा
जिन लोगों के घर बाढ़ में बह गए, आज भी वो टेंटों में या अस्थायी झोपड़ियों में रह रहे हैं. उनके लिए ये जानना बेहद कष्टदायक है कि अरबों डॉलर की मदद आई, लेकिन उनके हालात वही हैं. राहत शिविरों में अब भी साफ पानी और दवाइयों की कमी है. स्कूल और अस्पताल जो बाढ़ में डूब गए थे, उन्हें अब तक फिर से शुरू नहीं किया जा सका.
अंतरराष्ट्रीय छवि पर असर
पाकिस्तान की इस नाकामी का असर उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी पड़ा है. निवेशक देश और वित्तीय संस्थान अब यह सोच रहे हैं कि जब पहले से दी गई मदद का सही उपयोग नहीं हुआ तो आगे क्यों भरोसा किया जाए? IMF जैसी संस्थाएं भी अब हर बार शर्तों को और कड़ा कर रही हैं.
आगे का रास्ता
स्थिति संभालने के लिए पाकिस्तान सरकार को सबसे पहले ठोस और पारदर्शी योजना पेश करनी होगी. यह साफ करना होगा कि पैसा किस काम में लगेगा और उसका लाभ सीधे जनता तक कैसे पहुंचेगा. साथ ही राजनीतिक स्थिरता भी जरूरी है, वरना हर बार नई सरकार आकर पुराने फैसले बदलती रहेगी.
कमर चीमा जैसे एक्सपर्ट मानते हैं कि अगर पाकिस्तान इस मौके को गंवा देता है तो आगे कोई देश या संस्था इतनी उदारता नहीं दिखाएगी.
11 अरब डॉलर जैसी बड़ी रकम का इस्तेमाल न होना पाकिस्तान के लिए केवल आर्थिक नुकसान नहीं है, बल्कि ये उसकी साख पर भी बड़ा धब्बा है. शाहबाज शरीफ सरकार पर जनता और विशेषज्ञों का गुस्सा इसलिए भी है क्योंकि ये मदद सिर्फ रकम नहीं थी, बल्कि लोगों की जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की उम्मीद थी.
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पाकिस्तान में मदद की रकम का इस्तेमाल क्यों नहीं हो सका? ’11 अरब डॉलर का इस्तेमाल करने में नाकाम… ?












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