भारत को टैरिफ जाल में उलझाकर, मुनीर को ट्रंप का न्योता! अमेरिका-पाकिस्तान के बीच नया षड्यंत्र!
पिछले कुछ महीनों से भारत और अमेरिका के रिश्तों में जो गर्मजोशी देखी जा रही थी, उसमें अब हल्का-सा ठंडापन महसूस होने लगा है। इसकी बड़ी वजह बनी है अमेरिका का भारत पर टैरिफ को लेकर दबाव और वहीं दूसरी तरफ, पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर का बार-बार अमेरिका दौरा करना। ताजा खबर यह है कि मुनीर को पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से निजी मुलाकात का न्योता मिला है। इसने भारतीय रणनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है।
भारत पर अमेरिका का टैरिफ प्रेशर
हाल ही में अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर कुछ पुराने टैरिफ लाभों को सस्पेंड करने की बात कही है। इसके पीछे का तर्क अमेरिकी प्रशासन की तरफ से दिया गया – “भारतीय बाजार अभी भी अमेरिकी वस्तुओं के लिए पूरी तरह खुला नहीं है।”
मुख्य मुद्दे:
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टेक्सटाइल और फर्नीचर पर टैरिफ
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फार्मा सेक्टर में पेटेंट को लेकर कड़े नियम
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IT सर्विस सेक्टर पर अप्रत्यक्ष दबाव
ये सभी चीजें अमेरिका और भारत के बीच FTA (Free Trade Agreement) में रुकावट बन रही हैं।


मुनीर का अमेरिका दौरा: संयोग या रणनीति?
इसी बीच खबर आई कि पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर अमेरिका दौरे पर जा रहे हैं और उन्हें पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मिलने का न्योता मिला है। ट्रंप फिलहाल चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं, लेकिन ऐसे समय में पाकिस्तानी आर्मी प्रमुख को बुलाना सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार नहीं लगता।
क्या यह चीन की स्ट्रैटेजी का हिस्सा है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका, भारत की चीन के साथ बढ़ती दूरी का लाभ उठाकर पाकिस्तान के साथ अपने पुराने रिश्तों को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका का ये दोतरफा खेल भारत के लिए चिंताजनक हो सकता है।
पाक-अमेरिका रिश्तों की नई परिभाषा?
कुछ समय पहले तक अमेरिका पाकिस्तान को आतंकवाद पर नरमी के लिए फटकार लगाता रहा है। लेकिन अब स्थितियां बदल रही हैं:
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अमेरिका को अफगानिस्तान के हालात के लिए पाकिस्तान की ज़रूरत है
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चीन को काउंटर करने के लिए सेंट्रल एशिया में रणनीतिक सहयोग चाहिए
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पाकिस्तान IMF से बेलआउट की मांग में अमेरिका की लॉबी पर निर्भर है
ऐसे में पाक आर्मी और अमेरिका की नजदीकियां सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर भी गहरी हो सकती हैं।
भारत की स्थिति: अकेला पड़ रहा है या अपनी नीति पर कायम?
भारत अभी भी “वसुधैव कुटुम्बकम्” की नीति पर चलते हुए किसी एक ध्रुव की राजनीति से बचता आ रहा है। लेकिन यदि अमेरिका भारत को टैरिफ और डिप्लोमेसी के जाल में फंसाता है, और वहीं पाकिस्तान को रणनीतिक सहयोग देता है, तो यह भारत के लिए कूटनीतिक असहजता की स्थिति बन सकती है।
भारत को अब स्पष्ट और मजबूत रणनीतिक जवाब देना होगा:
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अमेरिका से सशक्त ट्रेड डायलॉग शुरू करना
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अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाक-अमेरिका मिलन पर कूटनीतिक सवाल उठाना
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एशियाई देशों के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को और पुख्ता करना
चीन की भूमिका: शतरंज की गोटियां फिर से सेट
चीन को इस पूरे घटनाक्रम में फायदा मिलता दिख रहा है। अमेरिका अगर भारत से व्यापारिक दूरी बनाता है, तो भारत चीन के प्रभाव वाले क्षेत्रों में निवेश बढ़ा सकता है। वहीं पाकिस्तान, अमेरिका और चीन दोनों के साथ बैलेंस बनाकर खुद को फिर से एक “मध्यस्थ ताकत” के रूप में पेश करना चाह रहा है।
निष्कर्ष: अब भारत को ‘चुप रहना’ नहीं, ‘रणनीति बोलनी’ चाहिए
भारत को अमेरिका के इस दोहरे रवैये पर चुप नहीं बैठना चाहिए। अब समय है कि भारत आर्थिक, कूटनीतिक और सामरिक स्तर पर अमेरिका को यह संदेश दे कि वह किसी का ‘जूनियर पार्टनर’ नहीं, बल्कि बराबरी का रणनीतिक सहयोगी है।
जनरल मुनीर और ट्रंप की मुलाकात भले ही प्रतीकात्मक हो, लेकिन इसके मायने गंभीर हैं। अगर भारत को टैरिफ के नाम पर कमजोर दिखाया गया और पाकिस्तान को कूटनीतिक प्लेटफॉर्म मिला, तो आने वाले वर्षों में दक्षिण एशिया की राजनीति एक नए मोड़ पर पहुंच सकती है।
अंत में, भारत को अपने हर फैसले में आत्मनिर्भरता और स्पष्टता बनाए रखनी होगी। वैश्विक राजनीति अब सिर्फ ताकत की नहीं, रणनीति की भी लड़ाई है – और भारत को इस गेम में ‘चालाक खिलाड़ी’ बनकर रहना होगा।
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