रूस में अमेरिकी टैरिफ पर जयशंकर ने दिया करारा जवाब-‘चीन खरीद रहा सबसे ज्यादा, LNG में EU हो नंबर वन भारत
मॉस्को की ठंडी मैदानियों में एक गर्म बहस की आग अब पुल बन चुकी है—और इस पुल के बीच हैं हमारे विदेश मंत्री, डॉ. एस. जयशंकर। अमेरिका द्वारा रूस से तेल खरीदने पर भारत को टैरिफ लगाने की सिफारिश पर जयशंकर ने स्पष्ट और निर्णायक प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उन्हें “यह तर्क समझ में नहीं आता”—लेकिन उन्होंने इसमें होशियारी से पूरे वैश्विक दृष्टिकोण पर जोर भी दिया।
जयशंकर ने यह स्पष्ट किया कि भारत रूस से सबसे बड़ा तेल खरीदार नहीं है—चीन सबसे बड़ा है, जबकि एलएनजी के मामले में यूरोपीय संघ अव्वल है। साथ ही, भारत ने अमेरिका से भी तेल का आयात बढ़ाया है, यह दर्शाते हुए कि यह नीति एकतरफा नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संतुलन का हिस्सा है।
लेकिन यह सिर्फ संख्या-तर्क नहीं है—यह एक द्वंद्व है, एक बहस कि क्या सच में केवल भारत पर निशाना साधा जा सकता है, जबकि बड़े खरीदारों को नजरअंदाज किया जाता है? जयशंकर ने इस बहस को उठाया, और कहा कि इस चयनात्मक आलोचना की तर्कसंगतता पर “हम हैरान हैं”।
रूस ने क्या कहा?
रूसी राजदूतों ने भी समर्थन जाहिर किया—उनका कहना है कि यह “अन्यायपूर्ण और खेदजनक” है, लेकिन उन्होंने आश्वासन भी दिया कि तेल आपूर्ति जारी रहेगी। साथ ही उन्होंने कहा कि एक ‘विशेष प्रणाली’ तैयार की गई है ताकि अमेरिकी दबावों के बावजूद ऊर्जा सहयोग साहसपूर्वक चलता रहे।
ऊर्जा साझेदारी में नया युग
मॉस्को में जयशंकर और रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के बीच हुई बातचीत ने एक बात स्पष्ट कर दी—यह सिर्फ व्यापार नहीं बल्कि रणनीतिक साझेदारी है। लावरोव ने भारत के साथ ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर जोर देते हुए कहा कि रूस और भारत दोनों अरctic और रूसी फार ईस्ट में ऊर्जा परियोजनाओं पर मिलकर काम कर सकते हैं।
यहां कूटनीतिक धारा साफ दिखती है—अमेरिकी दबाव के बीच भी दोनों देश अपने हितों को जोड़कर दुनिया को संदेश दे रहे हैं कि व्यापार और रणनीति सिर्फ नीतिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है।
सारांश तालिका
| मुद्दा | विवरण |
|---|---|
| जयशंकर का बिंदु | भारत सबसे बड़ा तेल खरीदार नहीं, चीन और EU पहले स्थान पर हैं |
| उर्जा आपूर्ति पर असर | रूस ने आश्वासन दिया कि “विशेष प्रणाली” से आपूर्ति जारी रहेगी |
| रणनीतिक विस्तार | भारत-रूस ऊर्जा साझेदारी — Arctic और Far East में परियोजनाएँ |
| वैश्विक संदेश | चयनात्मक आलोचना और अमेरिकी दबाव के बीच भारत ने डिप्लोमैसी खास की |
डॉ. जयशंकर ने इस गोष्ठी में साफ-साफ स्थिति पेश की—कि भारत की ऊर्जा नीति तर्कसंगत, संतुलित और राष्ट्रीय हित में है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि हम फैंसले अब तक नहीं पहुँचे हैं, लेकिन जब समय आएगा, हम उस राह को मजबूती से तय करेंगे—“cross that bridge when we come to it.” यही राजदूतों और कूटनीति की खूबी है।
यह बदलाव सिर्फ दर में नहीं, बल्कि सोच में है—भारत ने फिर दिखा दिया कि वह अपनी ऊर्जा स्वतंत्रता और रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने में संकोच नहीं करेगा।
‘चीन खरीद रहा सबसे ज्यादा, LNG में EU हो नंबर वन, भारत…’—रूस में अमेरिकी टैरिफ पर जयशंकर ने दिया करारा जवाब
मॉस्को की ठंडी मैदानियों में एक गर्म बहस की आग अब पुल बन चुकी है—और इस पुल के बीच हैं हमारे विदेश मंत्री, डॉ. एस. जयशंकर। अमेरिका द्वारा रूस से तेल खरीदने पर भारत को टैरिफ लगाने की सिफारिश पर जयशंकर ने स्पष्ट और निर्णायक प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उन्हें “यह तर्क समझ में नहीं आता”—लेकिन उन्होंने इसमें होशियारी से पूरे वैश्विक दृष्टिकोण पर जोर भी दिया।
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