6 लाख छात्रों को अमेरिका में पढ़ने की अनुमति: भारत के किस पड़ोसी मुल्क पर मेहरबान हुए डोनाल्ड ट्रंप?
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार मामला शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों से जुड़ा है। ट्रंप ने हाल ही में बयान दिया कि अमेरिका ने करीब 6,00,000 विदेशी छात्रों को पढ़ाई की अनुमति दी है। इनमें सबसे बड़ी संख्या एशियाई देशों की है। दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने अपने बयान में खास तौर पर चीन का ज़िक्र किया और कहा कि अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक रिश्ते उनके शासनकाल में कहीं बेहतर थे, बनिस्बत जो बाइडेन के दौर के।
चीन को लेकर ट्रंप का बड़ा बयान
ट्रंप ने कहा कि आज अमेरिका और चीन के बीच जितना आर्थिक सहयोग है, उतना पहले कभी नहीं रहा। हालांकि उन्होंने यह भी तंज कसा कि मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडेन के दौर में रिश्ते इतने मजबूत नहीं थे। ट्रंप के इस बयान को कई विशेषज्ञ आगामी अमेरिकी चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं।

शिक्षा और राजनीति का कनेक्शन
अमेरिका की यूनिवर्सिटीज़ लंबे समय से भारतीय और चीनी छात्रों की पहली पसंद रही हैं। भारत से हर साल लाखों छात्र उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाते हैं। लेकिन चीन की संख्या भी कम नहीं है। इसीलिए जब ट्रंप ने 6 लाख विदेशी छात्रों को पढ़ने की अनुमति देने की बात कही, तो इसमें चीन को मिली अहमियत साफ दिखाई दी।
भारत के लिए क्या मायने?
भारत अमेरिका का पुराना सहयोगी है और दोनों देशों के रिश्ते लगातार मजबूत हो रहे हैं। आईटी, स्टार्टअप्स और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत के छात्रों और पेशेवरों की अमेरिका में बड़ी मांग है। यही वजह है कि भारत से अमेरिका जाने वाले छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि जब ट्रंप चीन को तरजीह देने की बात कर रहे हैं, तो भारत के छात्रों के लिए इसका क्या असर होगा? क्या कहीं यह स्थिति भारत के खिलाफ जाएगी?
पड़ोसी मुल्क पर मेहरबानी क्यों?
ट्रंप का यह बयान संकेत देता है कि अमेरिका अभी भी चीन को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। चाहे राजनीतिक टकराव हो या व्यापारिक मतभेद, दोनों देशों के बीच शिक्षा और आर्थिक सहयोग का रिश्ता मज़बूत बना हुआ है। यही कारण है कि ट्रंप ने 6 लाख छात्रों में सबसे ज्यादा महत्व चीन के छात्रों को दिया।
कहा जा सकता है कि भारत के लिए यह एक चुनौती भी है और अवसर भी। चुनौती इसलिए कि चीन की बढ़ती मौजूदगी शिक्षा और रिसर्च में भारत के छात्रों को कड़ी प्रतिस्पर्धा देगी। अवसर इसलिए कि भारत के छात्रों की अंग्रेजी पर पकड़ और आईटी स्किल्स उन्हें अब भी चीन से आगे खड़ा करती हैं।

अमेरिका की रणनीति
विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका की यह रणनीति दोहरी है। एक तरफ वो भारत के साथ राजनीतिक और सामरिक साझेदारी बढ़ा रहा है, दूसरी तरफ चीन को शिक्षा और रिसर्च में जगह दे रहा है। यह अमेरिका के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद सौदा है। आखिरकार विदेशी छात्र अमेरिका की यूनिवर्सिटीज़ और अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान करते हैं।
डोनाल्ड ट्रंप का बयान साफ संकेत देता है कि आने वाले समय में अमेरिका शिक्षा को राजनीतिक कूटनीति का हथियार बना सकता है। भारत और चीन, दोनों ही देश अमेरिका के लिए अहम हैं लेकिन फिलहाल ट्रंप की नज़र चीन पर ज्यादा मेहरबान दिखाई दे रही है।
भारतीय छात्रों के लिए ज़रूरी है कि वे अपनी स्किल्स और रिसर्च पर काम करें ताकि किसी भी तरह की प्रतिस्पर्धा में पीछे न रहें।अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार मामला शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों से जुड़ा है। ट्रंप ने हाल ही में बयान दिया कि अमेरिका ने करीब 6,00,000 विदेशी छात्रों को पढ़ाई की अनुमति दी है। इनमें सबसे बड़ी संख्या एशियाई देशों की है। दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने अपने बयान में खास तौर पर चीन का ज़िक्र किया और कहा कि अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक रिश्ते उनके शासनकाल में कहीं बेहतर थे, बनिस्बत जो बाइडेन के दौर के।
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