क्या भारत पर लगेगा 500% टैरिफ? ट्रंप समर्थित बिल से बढ़ी चिंता
लेखक: [राहुल चंद्रे ] | तिथि: 11 जुलाई, 2025
हाल ही में अमेरिकी राजनीति में एक नई सनसनी मच गई है। रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों को सजा देने वाले एक प्रस्तावित बिल को अमेरिका के 80 से अधिक सांसदों का समर्थन मिला है। इस बिल में भारत जैसे देशों पर 500 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाने की बात कही गई है। अब सवाल ये उठता है – क्या अमेरिका सच में भारत पर इतना भारी शुल्क लगाएगा? और इससे भारत-अमेरिका संबंधों पर क्या असर पड़ेगा?
क्या है ये Russia Sanctions Bill?
“Russia Sanctions Enforcement Act” नामक यह बिल रूस के खिलाफ बनाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को और अधिक सख्त बनाने के इरादे से तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य रूस के वॉर फंड यानी युद्ध में लगने वाले आर्थिक संसाधनों को कमज़ोर करना है, ताकि वह यूक्रेन में अपना आक्रामक रवैया कम करे।
इस बिल के ज़रिए अमेरिका उन देशों पर प्रतिबंध लगा सकता है जो रूस से कच्चा तेल या अन्य महत्त्वपूर्ण वस्तुएं आयात कर रहे हैं। इनमें भारत, चीन, तुर्की जैसे देश शामिल माने जा रहे हैं।
भारत पर क्यों लग सकता है 500% टैरिफ?
अमेरिका के कुछ प्रभावशाली सांसदों का तर्क है कि भारत जैसे देशों द्वारा रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना अप्रत्यक्ष रूप से रूस की युद्ध नीति को बढ़ावा दे रहा है। अमेरिका का कहना है कि जब तक रूस को फंडिंग मिलती रहेगी, तब तक वह युद्ध नहीं रोकेगा।
पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों ने यहां तक कह दिया है कि अगर वो फिर से सत्ता में आते हैं, तो भारत पर 500% तक का टैरिफ लगाया जाएगा। उनका मानना है कि इससे भारत पर दबाव बनेगा और वह रूस से दूरी बनाएगा।
भारत का पक्ष क्या है?
भारत ने साफ किया है कि उसकी प्राथमिकता अपने नागरिकों को सस्ती ऊर्जा देना है। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर पहले भी कह चुके हैं कि भारत किसी के दबाव में नहीं चलता और अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोपरि मानता है।
भारत सरकार का यह भी कहना है कि वह रूस से तेल खरीद कर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का उल्लंघन नहीं कर रहा। भारत हमेशा से तटस्थ रहा है और उसने रूस-यूक्रेन युद्ध पर किसी का खुला पक्ष नहीं लिया है।
आर्थिक असर क्या हो सकता है?
अगर यह बिल पास हो जाता है और भारत पर 500% टैरिफ लगाया जाता है, तो इससे कई क्षेत्रों पर असर पड़ सकता है:
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भारतीय निर्यात उद्योग को बड़ा झटका लग सकता है, खासकर टेक्सटाइल, फार्मा और जेम्स-ज्वेलरी सेक्टर को।
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अमेरिकी बाजार में भारतीय वस्तुएं महंगी हो जाएंगी, जिससे प्रतिस्पर्धा कम हो सकती है।
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भारत को नई ऊर्जा रणनीति बनानी पड़ सकती है, जिससे सस्ता तेल मिल सके और वैश्विक दबाव भी ना पड़े।
क्या वाकई ये टैरिफ लगेगा?
फिलहाल यह बिल केवल प्रस्तावित है और अमेरिकी संसद में अभी इसकी चर्चा हो रही है। यह जरूरी नहीं कि हर प्रस्ताव कानून बन जाए। हालांकि, 80 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलना यह संकेत देता है कि यह मुद्दा गंभीरता से लिया जा रहा है।
इस बीच अमेरिका और भारत के बीच कूटनीतिक बातचीत तेज़ हो सकती है, ताकि टकराव की स्थिति से बचा जा सके। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले महीनों में अमेरिकी प्रशासन और भारत सरकार के बीच किस तरह के संवाद होते हैं।
निष्कर्ष: क्या भारत को घबराना चाहिए?
नहीं, अभी घबराने जैसी बात नहीं है। यह सही है कि अमेरिका का यह प्रस्ताव भारत के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है, लेकिन भारत की मजबूत कूटनीति और रणनीतिक स्थिरता ऐसी स्थिति से निपटने में सक्षम है। साथ ही, अमेरिका और भारत के बीच सहयोग बहुत गहरा है — दोनों देशों के बीच व्यापार, रक्षा और तकनीक जैसे क्षेत्रों में मजबूती है।
इसलिए, आने वाला वक्त इस मसले पर निर्णायक होगा, लेकिन भारत को जल्दबाज़ी में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए।
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