“हिंदी हमारी दादी है, मातृभाषा मां जैसी” — पवन कल्याण का बयान और भाषा की राजनीति पर दिया बड़ा बयान
आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने हाल ही में एक भाषा संगोष्ठी में जो बात कही, वह राजनीतिक भले ही न लगे, लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से बेहद अहम है। उन्होंने कहा — “मातृभाषा मां की तरह होती है, लेकिन हिंदी हमारी दादी के समान है।” इस एक लाइन ने न केवल दक्षिण भारत में हिंदी को लेकर जारी बहस को एक नया नजरिया दिया, बल्कि भाषा की विविधता को सम्मान देने की बात भी छेड़ी।
🌍 भारत में भाषाओं की विविधता
भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में से एक है जहां 22 से अधिक भाषाएं संविधान में मान्यता प्राप्त हैं, और सैकड़ों बोलियाँ-उपबोलियाँ आम लोगों की जिंदगी का हिस्सा हैं। लेकिन जब बात “राष्ट्रभाषा” या “संचार की भाषा” की होती है, तो बहस अक्सर हिंदी बनाम क्षेत्रीय भाषाओं पर केंद्रित हो जाती है।
🗣️ पवन कल्याण का बयान क्यों है अहम?
पवन कल्याण, जो एक लोकप्रिय अभिनेता से नेता बने हैं और मौजूदा समय में आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं, उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदी का विरोध केवल राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बन चुका है। उन्होंने कहा कि “हिंदी का प्रभाव शिक्षा, व्यवसाय और रोजगार के क्षेत्र में बढ़ रहा है। ऐसे में इसका विरोध केवल भाषा की राजनीति है, न कि व्यवहारिक सोच।”
उनके इस बयान से दो बातें सामने आती हैं —
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हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में नहीं, बल्कि एक सहयोगी भाषा के रूप में अपनाने की सोच।
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स्थानीय भाषा की अहमियत को बनाए रखते हुए हिंदी को विरोध की जगह सम्मान देना।
💬 “हिंदी हमारी दादी है” — भाव की भाषा
पवन कल्याण के इस वाक्य का मतलब यह नहीं है कि हिंदी मातृभाषा से ऊपर है, बल्कि यह कि हिंदी भारत की बहुभाषी संस्कृति में एक परिवार का हिस्सा है।
इस तुलना ने उस विभाजनकारी सोच को नकारा जिसमें “हिंदी थोपी जा रही है” जैसी बातें सुनाई देती हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि भाषा के नाम पर समाज को बांटना सही नहीं। हमें हर भाषा का सम्मान करना चाहिए — तेलुगु हो, तमिल हो, हिंदी हो या उर्दू।
🚫 हिंदी का विरोध: हकीकत और भ्रम
दक्षिण भारत में विशेषकर तमिलनाडु और कुछ अन्य राज्यों में हिंदी को लेकर समय-समय पर विरोध होता रहा है। आरोप होता है कि हिंदी “थोपी जा रही है”। जबकि हकीकत यह है कि हिंदी देश की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है और एक संचार सेतु के रूप में उभर रही है।
पवन कल्याण ने यही स्पष्ट किया कि जब कोई भाषा स्वाभाविक रूप से समाज में स्वीकार हो रही है, तो उसके खिलाफ राजनीतिक एजेंडे के तहत विरोध केवल नुकसानदायक है।
📚 हिंदी और रोजगार
बात करें हिंदी के व्यावसायिक और शैक्षिक महत्व की, तो आज सिविल सर्विस परीक्षा से लेकर मीडिया, फिल्मों, कॉर्पोरेट क्षेत्र और सोशल मीडिया में हिंदी का वर्चस्व लगातार बढ़ रहा है। यही कारण है कि कई दक्षिण भारतीय छात्र और पेशेवर आज हिंदी सीखने की तरफ भी आकर्षित हो रहे हैं।
✅ समाधान: संतुलन और सम्मान
भारत की ताकत उसकी भाषाई विविधता में है। यह जरूरी नहीं कि हर कोई हिंदी बोले, लेकिन यह भी जरूरी नहीं कि हिंदी का विरोध इसलिए किया जाए क्योंकि वह उत्तर भारत से जुड़ी है।
पवन कल्याण की सोच यही है — “हमें संतुलन चाहिए, टकराव नहीं। सम्मान चाहिए, विरोध नहीं।”
पवन कल्याण का यह बयान एक नई सोच का संकेत है। यह बयान बताता है कि हिंदी कोई शत्रु नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं की उस श्रृंखला का हिस्सा है, जो हमारी संस्कृति को जोड़ती है, न कि तोड़ती।
भाषा का सम्मान किसी एक की जीत नहीं, हम सबकी सांझा विरासत की जीत है।












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