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सुप्रीम कोर्ट में बड़ा खुलासा: ‘मरे हुए लोग भी बिहार में भर रहे SIR का फॉर्म’, ADR ने उठाए चुनाव आयोग पर सवाल

Bihar SIR

सुप्रीम कोर्ट में बड़ा खुलासा: ‘मरे हुए लोग भी बिहार में भर रहे SIR का फॉर्म’, ADR ने उठाए चुनाव आयोग पर सवाल


“अगर मरे हुए लोग भी सरकारी फॉर्म भर रहे हैं, तो लोकतंत्र में जिंदा लोगों का भरोसा कैसे बचेगा?”
यही सवाल अब पूरे देश के सामने है, जब सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई में बिहार में SIR (State Integrated Register) से जुड़े फॉर्मों की वैधता को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।


⚖️ क्या है मामला?

बिहार में चुनाव आयोग की ओर से SIR (State Integrated Register) के लिए बड़े पैमाने पर फॉर्म जमा किए गए। इन फॉर्मों के ज़रिए मतदाता सूची को अपडेट किया जाना था। लेकिन जब मामले की पड़ताल हुई, तो Association for Democratic Reforms (ADR) ने सुप्रीम कोर्ट में एक चौंकाने वाला दावा किया —

“इनमें से कई फॉर्म मरे हुए लोगों की तरफ से भरे गए हैं।”

SIR BIHAR
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📝 बिना दस्तावेज़ जमा हुए फॉर्म

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि चुनाव आयोग द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकड़े असलियत से मेल नहीं खाते।
कई फॉर्म्स ऐसे हैं जो बिना किसी पहचान पत्र या दस्तावेज़ के जमा कर दिए गए — मतलब, फर्जीवाड़ा होने की पूरी संभावना है।

ADR की रिपोर्ट के अनुसार, फॉर्मों की जांच करने पर पाया गया कि:

  • हजारों फॉर्मों में नाम और पहचान में गड़बड़ी है।

  • कई मृत व्यक्तियों के नाम दोबारा मतदाता सूची में दर्ज किए गए हैं।

  • दस्तावेजों की स्कैन कॉपी या मूल प्रमाणपत्र तक जमा नहीं किए गए।


🧑‍⚖️ सुप्रीम कोर्ट ने लिया संज्ञान

सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए कहा कि
“मतदाता पहचान और डेटा की शुद्धता लोकतंत्र की नींव है।”
अब इस मामले में 28 जुलाई 2025 को फिर से सुनवाई होगी, जिसमें कोर्ट चुनाव आयोग से जवाब तलब कर सकता है।


🧾 चुनाव आयोग का क्या है पक्ष?

चुनाव आयोग ने अपनी ओर से बताया कि:

  • SIR के ज़रिए मतदाता सूची को अद्यतन करना एक नियमित प्रक्रिया है।

  • डेटा वेरिफिकेशन एक सतत प्रक्रिया है और अनियमितताओं को सुधारने का प्रयास जारी है।

हालांकि कोर्ट में आयोग को यह साफ करना होगा कि:

  • कैसे बिना दस्तावेज़ फॉर्म स्वीकार किए गए?

  • मृत व्यक्तियों का नाम हटाने के बजाय दोबारा क्यों जोड़ा गया?

  • डेटा की शुद्धता की जिम्मेदारी किसकी है


🧨 ADR के आरोप कितने गंभीर?

ADR एक गैर-राजनीतिक संस्था है जो चुनावों और लोकतंत्र से जुड़े विषयों पर रिसर्च करती है।
उन्होंने अपनी जांच रिपोर्ट में कहा:

  • “यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई चूक लगती है।”

  • “इससे न सिर्फ बिहार का लोकतांत्रिक ढांचा प्रभावित हो रहा है, बल्कि पूरे देश में एक गलत मिसाल पेश हो रही है।”


🔍 क्या है SIR?

SIR (State Integrated Register) एक ऐसा डेटा सिस्टम है, जिसमें राज्य के सभी योग्य मतदाताओं का एकीकृत रिकॉर्ड रखा जाता है। इसका उद्देश्य है:

  • डुप्लीकेट नामों को हटाना

  • मृत व्यक्तियों के नाम सूची से निकालना

  • नई एंट्री को सही दस्तावेजों के आधार पर जोड़ना

लेकिन अगर इस प्रक्रिया में ही भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़ा हो, तो सवाल उठना लाज़िमी है।


🇮🇳 लोकतंत्र पर क्या पड़ेगा असर?

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। अगर मतदाता सूची ही संदिग्ध हो, तो चुनाव की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सीधा सवाल उठता है।

  • फर्जी वोटिंग का खतरा बढ़ जाता है

  • धांधली की संभावना बनती है

  • लोकतंत्र में जनता का विश्वास कमजोर होता है


आंकड़ों की बाज़ीगरी नहीं, सच्चाई चाहिए

यह मुद्दा सिर्फ बिहार या SIR तक सीमित नहीं है। यह एक चेतावनी है कि लोकतंत्र की बुनियाद कितनी कमजोर हो सकती है अगर उस पर राजनीति, लापरवाही और सिस्टम की चूक भारी पड़ जाए।

अब यह सुप्रीम कोर्ट के हाथ में है कि वो इस मामले में कैसी कार्रवाई करता है। लेकिन जनता को भी सजग रहने की ज़रूरत है — क्योंकि लोकतंत्र की रक्षा सिर्फ संस्थाएं नहीं, हम सब करते हैं।

 

 

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Author: newsviewss

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