संसद में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से पहले पी. चिदंबरम का बयान विवादों में, NIA और PAK को लेकर उठाए सवाल
संसद के भीतर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर होने वाली अहम बहस से ठीक पहले कांग्रेस नेता और पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम का बयान सुर्खियों में है। उन्होंने पहलगेम आतंकी हमले को लेकर नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) पर सवाल उठाए हैं और हमलावरों को ‘होमग्रोन टेररिस्ट’ करार दिया है। इससे न सिर्फ देश की सुरक्षा एजेंसियों की जांच प्रक्रिया पर बहस छिड़ गई है, बल्कि पाकिस्तान को लेकर सरकार के रुख पर भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
संसद में गरमाने वाला मुद्दा – ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और चिदंबरम का बयान
क्या है ‘

’?
‘ऑपरेशन सिंदूर’ सुरक्षा बलों द्वारा जम्मू-कश्मीर के पहलगेम इलाके में चलाया गया एक विशेष अभियान है। यह ऑपरेशन उस हमले के बाद शुरू किया गया था जिसमें तीन जवान शहीद हो गए थे और कुछ स्थानीय नागरिकों को भी चोटें आई थीं।
सरकार का दावा है कि यह हमला पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी संगठनों द्वारा किया गया था। इस ऑपरेशन का उद्देश्य आतंकियों को पकड़ना, उनके नेटवर्क को ध्वस्त करना और क्षेत्र में शांति बहाल करना है।
चिदंबरम का विवादित बयान: क्या NIA ने आतंकियों की पहचान की?
चिदंबरम ने संसद में बहस से पहले मीडिया से बात करते हुए कहा:
“क्या NIA के पास इस बात के पक्के प्रमाण हैं कि हमला पाकिस्तान प्रायोजित था? या यह हमला स्थानीय स्तर पर पनप रही कट्टरपंथी सोच का नतीजा है?”
उन्होंने कहा कि जब तक NIA किसी स्पष्ट नतीजे पर नहीं पहुंचती, तब तक पाकिस्तान को सीधे दोष देना जल्दबाजी होगी। उन्होंने यह भी जोड़ा कि कई बार सुरक्षा एजेंसियां राजनीतिक दबाव में आकर निष्कर्ष पर पहुंचती हैं।
भाजपा का पलटवार: चिदंबरम का बयान राष्ट्रविरोधी?
चिदंबरम के बयान पर भाजपा और अन्य राष्ट्रवादी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। भाजपा प्रवक्ता ने कहा:
“यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक पूर्व गृह मंत्री सुरक्षा एजेंसियों पर सवाल उठा रहे हैं और पाकिस्तान को परोक्ष रूप से क्लीन चिट दे रहे हैं। यह उन जवानों का अपमान है जो अपनी जान की बाज़ी लगाते हैं।”
बीजेपी ने चिदंबरम पर यह भी आरोप लगाया कि वह कांग्रेस की उसी नीति को आगे बढ़ा रहे हैं, जो आतंकवाद पर नरमी बरतने के लिए जानी जाती रही है।
‘होमग्रोन टेरर’ बनाम ‘एक्सटर्नल सपोर्ट’: बहस के दो ध्रुव
यह बहस अब दो हिस्सों में बंट चुकी है:
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सरकारी पक्ष: हमला पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकी संगठनों (जैसे जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा) का handiwork है। सीमा पार से हथियारों और साजिश की जानकारी मिली है।
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विपक्षी पक्ष (चिदंबरम का तर्क): आतंकी स्थानीय रूप से कट्टरपंथ से प्रभावित हो सकते हैं। यह पूरी तरह “आत्मनिर्भर आतंक” (Homegrown Terrorism) हो सकता है, जिसमें किसी बाहरी शक्ति की भागीदारी नहीं है।
NIA की प्रतिक्रिया
NIA ने आधिकारिक रूप से अब तक किसी निष्कर्ष की घोषणा नहीं की है, लेकिन शुरुआती जांच में सीमा पार से संचार, GPS डेटा और विदेशी हथियारों के उपयोग की पुष्टि हुई है। इन संकेतों से सुरक्षा एजेंसियां इसे पाकिस्तान से जुड़ा हमला मान रही हैं।
राजनीति और सुरक्षा: कब एक-दूसरे से टकराते हैं?
यह कोई पहली बार नहीं है जब आतंकी हमले के बाद राजनीतिक बयानबाज़ी ने सुरक्षाबलों के कार्य पर सवाल उठाए हों।
लेकिन जब देश के पूर्व गृह मंत्री ही सार्वजनिक रूप से NIA की निष्पक्षता पर सवाल उठाएं, तो यह न केवल सुरक्षा बलों का मनोबल तोड़ता है, बल्कि देश के भीतर एक गहरे वैचारिक विभाजन को भी उजागर करता है।
क्या यह बहस ज़रूरी है या नुकसानदेह?
एक तरफ यह तर्क दिया जा सकता है कि लोकतंत्र में सवाल पूछना ज़रूरी है — खासकर जब बात सुरक्षा एजेंसियों और जांच प्रक्रिया की हो।
दूसरी तरफ, आतंक जैसे संवेदनशील विषय पर बिना ठोस सबूत सार्वजनिक बयान देना न सिर्फ गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि देश के दुश्मनों को ताकत भी दे सकता है।
अब देखना यह होगा कि संसद में इस मुद्दे पर होने वाली बहस में क्या निष्कर्ष निकलता है और क्या चिदंबरम अपने बयान पर कायम रहते हैं।
संसद में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से पहले पी. चिदंबरम का बयान विवादों में, NIA और PAK को लेकर उठाए सवाल
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