जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित — लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने गठित की जांच समिति, न्यायपालिका की जवाबदेही पर बड़ा कदम
घटना की शुरुआत:
यह 12 अगस्त 2025 का दिन भारतीय न्याय व्यवस्था और राजनीतिक साझा जिम्मेदारी के लिहाज से ऐतिहासिक माना जाएगा। उस दिन लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने जस्टिस यशवंत वर्मा पर महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार कर परदाफाश विराम शुरु कर दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट में कार्यरत इस न्यायाधीश पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा है—उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास से बर्न्ट कैश बरामद हुआ था।
क्या है महाभियोग प्रस्ताव का महत्व?
महाभियोग प्रस्ताव संसद द्वारा किसी न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रियात्मक शुरुआत होती है।
इस मामले में 146 सांसदों (राज्यसभा व लोकसभा दोनों) के हस्ताक्षर शामिल थे—जिसमें सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के प्रतिनिधि थे। यह संख्या कानूनी न्यूनतम आवश्यकता (राज्यसभा के 50 और लोकसभा के 100 सांसद) से कहीं अधिक है
जांच समिति का गठन:
स्पीकर ने एक तीन-सदस्यीय समिति गठित की है जो इस मामला की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच करेगी। इस समिति में शामिल हैं:
- न्यायमूर्ति अरविंद कुमार (सुप्रीम कोर्ट)
- न्यायमूर्ति मनिंदर मोहन श्रीवास्तव (मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस)
- वरिष्ठ अधिवक्ता बी. वासुदेव आचार्य (कर्नाटक हाईकोर्ट)
इस समिति को “भ्रष्टाचार के लिए जीरो टॉलरेंस” नीति के तहत मामले की गहन जांच करनी है, और जल्द रिपोर्ट प्रस्तुत करनी है
प्रक्रिया आगे कैसी होगी?
यदि समिति अपराध सिद्ध करती है, तो लोकसभा में एक मतदान के बाद राज राष्ट्रपति को इस प्रस्ताव की सिफारिश भेजा जाएगा। वही मंजूरी मिलने पर न्यायाधीश को हटाया जा सकता है
क्या विरोध और समर्थन में टकराव भी देखे?
- कांग्रेस नेता शशि थरूर ने इस प्रक्रिया में निष्पक्ष और विस्तृत जांच की मांग करते हुए कहा कि लोकतंत्र में न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनी रहनी चाहिए
- Navbharat Times ने लिखा कि इतिहास में ऐसी जटिल महाभियोग प्रक्रियाएं अक्सर “कानूनी कीड़ों में उलझ कर रह जाती हैं,” और इससे जनता का भरोसा न्याय व्यवस्था से प्रभावित हो सकता है
- Congress का आरोप है कि सरकार ने राज्यसभा प्रस्ताव को नजरअंदाज करते हुए लोकसभा का पलड़ा भारी किया—इसे “छोटा मानसिकता” वाला कदम बताया गया है
यह कदम केवल एक नियम-कानून की प्रक्रिया नहीं बल्कि न्यायपालिका में उत्तरदायित्व और पारदर्शिता की दिशा में बड़े पैमाने पर शुरुआत है। जस्टिस वर्मा मामले पर बन रही जाँच कमेटी का निष्पक्ष रवैया, रिपोर्ट की समय सीमा, और संसद की आगे की कार्यवाही इस प्रणाली की मजबूती या कमजोरी तय करेगी।
हम सब की निगाहें अब इस समिति की रिपोर्ट और संसद के अगले कदमों पर टिकी हैं—क्या यह लोकतंत्र में एक मजबूत मानक बनाएगा, या फिर वही पुराने राजनैतिक घपले हाथ बदलने का बहाना साबित होगा?
यह 12 अगस्त 2025 का दिन भारतीय न्याय व्यवस्था और राजनीतिक साझा जिम्मेदारी के लिहाज से ऐतिहासिक माना जाएगा। उस दिन लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने जस्टिस यशवंत वर्मा पर महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार कर परदाफाश विराम शुरु कर दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट में कार्यरत इस न्यायाधीश पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा है—उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास से बर्न्ट कैश बरामद हुआ था।
महाभियोग प्रस्ताव संसद द्वारा किसी न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रियात्मक शुरुआत होती है।
इस मामले में 146 सांसदों (राज्यसभा व लोकसभा दोनों) के हस्ताक्षर शामिल थे—जिसमें सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के प्रतिनिधि थे। यह संख्या कानूनी न्यूनतम आवश्यकता (राज्यसभा के 50 और लोकसभा के 100 सांसद) से कहीं अधिक है
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