अलास्का मीटिंग में पुतिन संग मिलकर ट्रंप ने यूक्रेन को दिया धोखा! जेलेंस्की से मुलाकात से ठीक पहले दिया अल्टीमेटम – “NATO, क्रीमिया भूल जाओ”
Donald Trump-Zelensky Meeting:
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के शतरंज पर आज जो चाल चली गई है, उसने दुनिया को चौंका दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की हालिया मुलाकात के बाद एक नया मोड़ सामने आया है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से बैठक से ठीक पहले ट्रंप ने अल्टीमेटम दिया – “NATO की उम्मीद छोड़ो और क्रीमिया को रूस का हिस्सा मान लो”।
यह बयान न केवल यूक्रेन बल्कि पूरे यूरोप और NATO देशों के लिए झटका है। ट्रंप का यह रुख उस रणनीति की याद दिलाता है, जब अमेरिका ने भारत-पाकिस्तान मुद्दे पर दोहरी नीति अपनाई थी। सवाल यह है कि क्या ट्रंप ने यूक्रेन को पुतिन के सामने बलि का बकरा बना दिया है?


🔹 ट्रंप-पुतिन की गुप्त डील का शक
विश्लेषकों का कहना है कि अलास्का में हुई ट्रंप-पुतिन बैठक का असली एजेंडा अब सामने आ रहा है। भले ही सीजफायर की घोषणा न हुई हो, लेकिन रूस के लिए सबसे बड़ा फायदा यह है कि अमेरिका ने यूक्रेन पर दबाव डालना शुरू कर दिया है।
ट्रंप का कहना है कि “यूक्रेन के लिए NATO सदस्यता अब चर्चा का विषय नहीं है। अगर शांति चाहिए तो समझौता करना होगा।”
इस अल्टीमेटम के बाद साफ हो गया है कि अमेरिका अब यूक्रेन को बिना शर्त समर्थन देने के पक्ष में नहीं है।
🔹 जेलेंस्की के सामने कड़ा इम्तिहान
जेलेंस्की के लिए यह स्थिति किसी दुःस्वप्न से कम नहीं।
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एक ओर उनका देश रूसी हमलों से जूझ रहा है।
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दूसरी ओर अमेरिका, जो अब तक सबसे बड़ा सहयोगी था, समझौते का दबाव बना रहा है।
जेलेंस्की ने बयान दिया है कि “यूक्रेन अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा। क्रीमिया यूक्रेन का हिस्सा था और हमेशा रहेगा।”
लेकिन ट्रंप के संकेत साफ करते हैं कि अगर यूक्रेन ने लचीलापन नहीं दिखाया तो अमेरिका का रवैया और सख्त हो सकता है।
🔹 NATO देशों में बढ़ी बेचैनी
ट्रंप की इस नई नीति से NATO देशों में भी हलचल बढ़ गई है।
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पोलैंड और बाल्टिक देश पहले से ही रूस के खतरे को लेकर चिंतित हैं।
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जर्मनी और फ्रांस शांति समझौते की दिशा में दबाव बना रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या ट्रंप का “क्रीमिया फॉर्मूला” यूरोप में स्थायी शांति ला पाएगा या यह केवल रूस को और मजबूत करेगा?
🔹 भारत के लिए मायने
भारत के लिए भी यह घटनाक्रम बेहद अहम है।
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रूस भारत का पारंपरिक मित्र है।
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अमेरिका के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी लगातार बढ़ रही है।
अगर अमेरिका-रूस की यह “नई दोस्ती” गहरी होती है तो भारत को कूटनीति में और भी ज्यादा संतुलन साधना होगा।
🔹 विशेषज्ञों की राय
भू-राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप का यह अल्टीमेटम केवल शुरुआत है।
👉 यह संभव है कि आने वाले दिनों में अमेरिका रूस को आर्थिक रियायतें देने के बदले यूक्रेन पर दबाव बढ़ाए।
👉 दूसरी ओर, अगर यूक्रेन झुकता है तो रूस को क्रीमिया और डोनबास क्षेत्र पर अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिल सकती है।
ट्रंप का “NATO और क्रीमिया भूल जाओ” वाला बयान दुनिया को यह दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी दोस्ती या दुश्मनी जैसी कोई चीज़ नहीं होती। यह पूरी तरह हितों और सौदेबाजी पर टिकी होती है।
यूक्रेन के लिए यह स्थिति बेहद कठिन है – या तो वह समझौता कर अपनी भूमि का हिस्सा खो दे, या फिर अकेले रूस से लड़ाई जारी रखे। आने वाले दिनों में ट्रंप-जेलेंस्की मुलाकात से बहुत कुछ साफ होगा, लेकिन इतना तय है कि आज की स्थिति में यूक्रेन खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है।
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