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Supreme Court का बड़ा फैसला, बिहार में वोटर लिस्ट रिवीजन जारी रहेगा, रोक से इनकार

Supreme Court

बिहार में वोटर लिस्ट रिवीजन के मामले में सुप्रीम कोर्ट(Supreme Court) में गुरुवार को 3 घंटे लंबी सुनवाई हुई। इसमें चुनाव आयोग और चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देने वालों की ओर से तमाम दलीलें रखी गई। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बिहार विधानसभा चुनाव से पहले वोटर लिस्ट के रिवीजन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि आधार, वोटर आईडी, राशन कार्ड को भी पहचान पत्र मानें। अब अगली सुनवाई 28 जुलाई को होगी।

EC के किसी फैसले समस्या नहीं है, समस्या इसकी टाइमिंग से है- Supreme Court

इससे पहले वोटर लिस्ट रिवीजन मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट(Supreme Court) ने कहा है कि उसे चुनाव आयोग के किसी ऐसे किसी कदम से समस्या नहीं है, समस्या इसकी टाइमिंग से है। सुप्रीम कोर्ट कहा कि बिहार में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कराने के चुनाव आयोग के कदम में तर्क और व्यावहारिकता निहित है, लेकिन अदालत ने विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले होने वाली इस कवायद के समय पर सवाल उठाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर आपको यह करना ही था तो फिर आपने इतने देरी क्यों की? यह चुनाव से ठीक पहले नहीं होना चाहिए।

आयोग को यह देखने का अधिकार है कौन वोटर बन सकता है- Supreme Court

जस्टिस सुधांशु धुलिया और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि चुनाव आयोग का यह कार्य उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। आयोग को यह देखने का अधिकार है कि कोई अयोग्य व्यक्ति वोटर न बन सके। साथ ही कोर्ट(Supreme Court) ने यह भी माना कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है और मतदाता बनने के लिए नागरिकता का प्रमाण आवश्यक हो सकता है। जस्टिस धुलिया ने कहा, “अगर 2003 की लिस्ट है तो यह दलील दी जा सकती है कि अब घर-घर जाने की जरूरत नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि वोट डालते आ रहे लोगों से दोबारा नागरिकता क्यों मांगी जा रही है? अगर आप वोटर लिस्ट में किसी शख्स का नाम सिर्फ देश की नागरिकता साबित होने के आधार पर शामिल करेंगे तो फिर ये बड़ी कसौटी होगी। यह गृह मंत्रालय का काम है। आप उसमें मत जाइए।”

“चुनाव आयोग का ये संशोधन “मनमाना” और “भेदभावपूर्ण” है”

मामले की सुनावई के दौरान Supreme Court में वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए। उन्होंने दलील दी कि किसी को भी मतदाता सूची से बाहर करने की प्रक्रिया यह है कि एक व्यक्ति किसी के खिलाफ अपनी आपत्ति का सबूत देता है। फिर चुनाव आयोग सुनवाई के लिए नोटिस जारी करता है लेकिन यहां सामूहिक रूप से 4-7 करोड़ लोगों को निलंबित कर दिया गया है और कहा गया है कि यदि आप फॉर्म नहीं भरते हैं तो आप बाहर हो जाएंगे। इससे पहले याचिकाकर्ताओं में से एक वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने तर्क दिया कि चुनाव आयोग का ये संशोधन “मनमाना” और “भेदभावपूर्ण” है, क्योंकि यह मतदाता सूची में एक दशक से अधिक समय से शामिल मतदाताओं को अपनी नागरिकता फिर से सत्यापित करने के लिए बाध्य करता है।

आयोग केवल अपना काम कर रहा है- EC के वकील

चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि आयोग को यह शक्ति संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मिली है। उन्होंने कहा कि आयोग केवल अपना काम कर रहा है और यह कहना गलत है कि हम बड़े पैमाने पर नाम हटाने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि अभी प्रक्रिया चल रही है। लोगों को ड्राफ्ट लिस्ट के बाद आपत्ति दर्ज करने और सुनवाई का पूरा मौका दिया जाएगा। उन्होंने कोर्ट से कहा कि आयोग को अपनी प्रक्रिया पूरी करने दी जाए। उन्होंने कोर्ट(Supreme Court) में आश्वासन दिया कि किसी को बिना सुनवाई के लिस्ट से बाहर नहीं किया जाएगा।

इंडिया गठबंधन को चुनाव आयोग के फैसले पर संदेह

दरअसल कांग्रेस, RJD समेत इंडिया गठबंधन की 9 पार्टियों ने वोटर लिस्ट सत्यापन की प्रक्रिया पर तुरंत रोक लगाने की मांग की है। दूसरी ओर, वकील अश्विनी उपाध्याय ने याचिका दायर कर कहा है कि केवल भारतीय नागरिकों को ही वोट देने का हक मिलना चाहिए। उपाध्याय ने दावा किया कि अवैध घुसपैठ की वजह से देश के 200 जिलों और 1500 तहसीलों में जनसंख्या का ढांचा बदल गया है। उनकी याचिका में कहा गया है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए घुसपैठियों को वोटर लिस्ट से हटाने के लिए सत्यापन जरूरी है। इस मुद्दे पर बिहार में विपक्षी दलों के तीखे प्रदर्शन और चुनाव आयोग के सख्त रुख ने माहौल को और गर्म कर दिया है।

Mukul Dwivedi
Author: Mukul Dwivedi

I graduated From the University of Allahabad and PG diploma in Mass communication From Government Polytechnic Lucknow. After study worked with Bharat samachar as Trainee Producer. Currently I am working With Ekal Bharat as a Producer.

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